कौन हूँ मैं?

कौन हूँ मैं?
पहचानो थोड़ा सा,
मुझे मेरे नाम से जानते हो,
या मेरे धर्म से,
या यह जो मैं,
कुछ भी लिखती रहती हूँ,
आप वाह-वाह करते हो!
या,
मेरे छोटे-मोटे कारनामों से,
कैसे पहचानते हो मुझे,
सूरत की बात मत करना,
सीरत की भी नहीं,
क्यूँकि वो तो तुम जानते ही नहीं,
कितनी फ़िल्टर से गुज़रती है!
यह तो तुम ख़ुद ही कहते-समझते हो,
फिर क्या जानते हो,
कितना पहचानते हो,
क्या समझते हो,
जो मैं सोचती हूँ,
मेरे विचार,
मेरे निष्कर्ष,
फिर क्या?
यह तो तुम ख़ुद ही कहते-समझते हो,
फिर क्या जानते हो,
कितना पहचानते हो,
क्या समझते हो,
जो मैं सोचती हूँ,
मेरे विचार,
मेरे निष्कर्ष,
फिर क्या?
क्या कभी सोचा है,
की
क्यूँ स्वयं को बाँधु,
मैं इन बंधनों में,
रहने दूँ क्यूँ ना,
स्वयं को अपने जैसा,
क्यूँ बनाऊँ,
तुम्हारे जैसा…
#ऋतु

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दोपहर/Dopahar


Pic: Ritu

रातों की बातें करता है
चाँद को तकता है
सितारों की चमक में
ख़ुद को खोता है
सुबह के उजियारे में
नयी आशाओं को
जन्म देता है
यह दिल क्यूँ
#दोपहर को भूल जाता है
जागी आँखों से
जब सारे सपने देखता है
दिन की नीरवता
जब हौले से आ
रेशमी लटों को सहलाती है
कहीं से तो दबी-छुपी
कुछ यादें आ
मन को कसोट जाती हैं….
#ऋतु

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शब्द / Shabd

शब्द रूठे हुए हैं,
ब्रश एक कोने में उदास बैठे हैं,
पन्नों पर कुछ हिसाब
लिखे हुए हैं बस,
किताबें धूल में लिपटी हुई
भूली-बिसरी सी सिमटी हुई हैं,
मेरे विचारों को नज़र लग गयी लगती है
दूसरे कोने में गुमसुम से बैठे,
बस खिड़की से बाहर ताकते नज़र आते हैं,
ना कुछ बोलते हैं,
ना सुनना चाहते हैं,
इनके भँवर भी हल्के पड़े हुए हैं,
गरमी की धूप से सब कुम्हलाये
नज़र आते हैं…..
#ऋतु

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जुर्रत / Zurrat

सोचती हूँ हर्फ़-दर-हर्फ़,
जोड़ लूँ तुम्हें
अपने पास सारा का सारा
इकट्ठा कर लूँ तुम्हें
जैसा चाहती हूँ
वैसा मुमकिन कर लूँ तुम्हें
माना कि ख़ुदगर्ज़ हूँ यहाँ
फिर भी यह जुर्रत कर लूँ थोड़ी
ख़यालों से निकाल
रूबरू कर लूँ तुम्हें….
#ऋतु

Sochti hoon harf-dar-harf
Joḍ loon tumhe
Apne paas saara ka saara
Ekattha kar loon tumhe
Jaisa chahti hoon
Waisa mumakin kar loon tumhe
Maana ki khudagarz hoon yahan
Phir bhi yeh zururat kar loon thoḍi
Khayaloṅ se nikal
Rubaru kar loon tumhe….
#ऋतु

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अकेलापन / Akelapan 

Pic: Ritu


क्यूँ इतना अनोखा होता है यह अकेलापन 
अलग-थलग सा पड़ा रहता है

एक कोने में

चुपचाप सा

बिन बोले, 

पर फिर भी कितना अपना सा।

जब कोई साथ नहीं देता 

बिना शर्त साये की तरह 

चिपका रहता है,

सुकून सा मिलता है इसके होने से।

कभी भीड़ में महसूस किया है? 

अपने वज़ूद का अहसास कराता है 

यह अकेलापन। 

एक बिछड़े हुए पुराने यार की तरह

कभी ज़िंदगी से अलविदा ना कहता हुआ 

अपनेपन का अहसास कराता हुआ 

यह मेरा अकेलापन। 

                  Kyun itna anokha hota hai

                   Yeh akelapan

                    Alag-thalag sa pada rahta hai

                    Ek kone mein

                    Chupchap sa 

                     Bin bole,

                     Par phir bhi kitna apna sa

                      Jab koi saath nhi deta

                      Bina shart saaye ki tarah

                      Chipka rehta hai,

                      Sukoon sa milta hai iske hone se!

                      Kabhi mehsoos kiya hai?

                      Apne wazood ka ehsaas karata hai

                     Yeh akelapan!

                    Ek bichde hue purane yaar ki tarah,

                   Kabhi zindagi se alavida na kehta hua,

                   Apne pan ka ehsaas karata hua

                   Yeh mera akelapan! 
– #ऋतु 

                         

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बचपन / Bachpan

Pic courtsey: Vivek @romeomustlivee


छोटी-छोटी आँखों में

ऊनींदे से सपने

कभी रेड लाइट पर 

गाड़ियों के काँच साफ़ करते

तो कभी फुटपाथों पर ऊँघते हुए

कितनी बातें, कितने सपने 

रोज़ बुनते होंगे 

वो छोटे छोटे हाथ 

कितनी कहानियाँ रोज़ सुनते होंगे 

पर पत्थरों के बीच रहते हुए

एक दिन 

कहीं पत्थर न हो जाएँ 

 लोहे की गाड़ियों की चाल में 

बचपन कहीं ख़ुद न खो जाए। 
             Choṭi-choṭi aaṅkhoṅ mein

             Unnende se sapne

              Kabhi red light par

              Gaaḍiyoṅ ke kaaṅch saaf karte

              To kabhi footpathon par unghate hue

               Kitni baateiṅ, kitne sapne

               Roz bunte honge

               Wo chote-choṭe haath

                Kitni kahaniyaṅ roz sunte honge

                Par pattharoṅ ke beech rehte hue

                 Ek din

                Kahin patthar na ho jaayein

                 Lohe ki gaaḍiyoṅ ki chaal mein

                 Bachpan kahin khud na kho jaaye…
– #ऋतु 

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सर्दी की धूप / Sardi ki dhoop

सर्दी की धूप जैसी है वो

कभी गुनगुनाती सुकून देती हुई

तो कभी तेज़ चमक कर

हाथों को जलाती हुई

मन करता है उसकी छांव में 

थोड़ा और सुस्ता लूँ 

तो कभी सहम कर छाया बन 

किसी कोने में सिमट जाऊँ 

कैसी पहेली सी है

कभी अपनी तो 

कभी परायों से भी 

परायी सी क्यूँ है वो।
Sardi ki dhoop jaisi hai woh  

Kabhi gunagunati sukoon deti hui
To kabhi tej chamak kar

Haathoṅ ko jalati hui

Man karta hai uski chaanv mein

Thoda aur susta loon

To kabhi saham kar chaaya ban

Kisi kone mein simaṭ jaaoṅ

Kaisi paheli si hai

Kabhi apni to

Kabhi prayon se bhi

Prayi si kyun hai wo!

– Ritu 

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